होली का त्यौहार देश में सदियों से मनाया जाता है। इस त्यौहार के बारे में अलग-अलग इतिहास पुराण और साहित्य के बारे में बताया गया है। हर वर्ष फाल्गुन मास के पूर्णिमा दिन होलिका दहन और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन होली मनाई जाती है। इसको वसंतोत्सव भी कहते है | इस दिन देश अबीर-गुलाल और रंग से तरबतर हो जाता है। हर कोई एक दूसरे पर प्यार का रंग बरसाता है।
विभिन्न रंग हमारी भिन्न-भिन्न भावनाओं और अनुभूतियों से जुड़े होते हैं। क्रोध का संबंध लाल रंग से, ईर्ष्या का हरे से, प्रसन्नता तथा उल्लास पीले से, प्रेम गुलाबी से, विशालता नीले से, शांति सफ़ेद से, बलिदान केसरिया से तथा ज्ञान बैंगनी रंग से जुड़े हैं। प्रत्येक व्यक्ति रंगों का एक फ़व्वारा है जो अपने वर्ण, अपनी रंगत को बदलते रहते हैं। यदि आपका जीवन भी होली के समान हो, जिसमें प्रत्येक रंग स्पष्टतः दिखे तो वह आपके जीवन को आकर्षण से भर देगा। विविधता में सांमजस्य, यह जीवन को जीवंत, उल्लासपूर्ण तथा अधिक रंगीन बना देता है।
भक्त प्रहलाद की कथा
भक्त प्रहलाद भगवान विष्णु नारायण का भक्त था। विष्णु पुराण कथा के अनुसार भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप नाम का दैत्य था, जो पुत्र को भगवान विष्णु की आराधना से मना किया। पुत्र के नहीं मानने पर अपने सेवकों से मारने का आदेश दिया। सेवकों ने अस्त्र, शस्त्र, तीर, भाले, हाथियों से कुचलवाया, शेर, विष और हथियार से वार किया, लेकिन प्रहलाद को भगवान विष्णु जी का वरदान होने के कारण कुछ नहीं हुआ। दैत्य हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान मिला था। दैत्य भाई के कहने पर होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में जलाने के लिए बैठ गई। होलिका का ये वरदान भी प्रह्लाद के पास न टिक सका। प्रह्लाद उसी अग्नि से खेलते बाहर आ गए और होलिका का अंत हो गया। तभी से लोगों होली से एक दिन पहले होलिका दहन का पर्व मनाते आ रहे हैं। लोगों का मानना है कि बुराई में अच्छाई की जीत और शक्ति में भक्ति की विजय का पर्व को होली के रूप में मनाया जाता है।
राधा-कृष्ण से जुड़ी कथा
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान श्रीकृष्ण सांवले रंग के थे और राधा रानी गोरी थी। इस बात को लेकर कन्हैया अपनी मैया यशोदा से शिकायत करते हैं, कि राधा क्यों गोरी और मैं क्यों काला। तो माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण को कहा कि जो तुम्हारा रंग है वहीं रंग राधा को लगा दो, तब दोनों एक ही रंग के हो जाओगे और ये शिकायत भी खत्म हो जाएगी। फिर क्या था, नटखट नंद यशोदा अपनी टोली के साथ राधा को रंगने पहुंच गए और राधा के साथ अन्य सखियों को रंग लगाया। लोगों का ऐसा मानना है, कि तभी से रंगों वाली होली के त्यौहार की शुरुआत हुई। इसके बाद आज भी श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा-वृन्दावन में खूब हर्षोल्लास के साथ होली का त्यौहार खूब मन पसंद से मनाया जाता है।
महत्त्व
यह त्योहार वसंत ऋतु के आगमन और नई फसल की खुशी में भी मनाया जाता है। किसान इस समय अन्न उत्पादन की समृद्धि का उत्सव मनाते हैं।
होली के दिन पारंपरिक लोकगीत, नृत्य और ढोल-नगाड़ों की धुन पूरे माहौल को उल्लास से भर देती है।
होली पूजन और दहन का मुहूर्त
13.03.2025 को फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी दिन में 10.02 मिनट तक है उसके बाद पूर्णिमा लग रही है | भद्रा का आरम्भ तभी से हो रहा है | जो रात के 10.37 मिनट तक है | होलिका दहन रात 10.37 के बाद ही होगा | होलिका दहन के पहले ढूंढा राक्षसी का पूजन होता है | होलिका पूजन में शुष्क काष्ठ गोमय पिंड नारिकेल आदि से पूजन किया जाता है | होलिका दहन को बुराई के नाश का प्रतीक माना जाता है। उदय व्यापिनी चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंगोत्सव ,वसंतोत्सव रतिकम महोत्सव को होली मनाई जाती है | इस वर्ष १५.०३.२०२५ दिन शनिवार को होली मनाई जाएगी | होली सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, आध्यात्मिक शुद्धिकरण और आनंद का उत्सव है। यह हमें सिखाती है कि हमें आपसी द्वेष और मतभेदों को भूलकर प्रेम और भाईचारे को अपनाना चाहिए।