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Pujari Ji

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा

श्री विष्णुपद मंदिर, गया
  • प्रमाणित पुजारी
  • पूरी पूजा सामग्री
  • वैदिक विधि-विधान
  • मार्गदर्शन व सहायता
त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा

त्रिपिंडी श्राद्ध एक विशेष पितृ अनुष्ठान है, जिसमें पूर्वजों एवं प्रेतों की तृप्ति, शांति तथा सद्गति की मंगलकामना की जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार यह कर्म उन पूर्वजों के निमित्त भी कराया जाता है, जिनका श्राद्ध, तर्पण अथवा अन्य पितृ कर्म किसी कारणवश पूर्ण नहीं हो पाया हो या जिनके लिए विशेष पितृ शांति की आवश्यकता मानी जाती हो।

इस अनुष्ठान में तीन पिंडों का विशेष महत्व है। शास्त्रीय पद्धति के अनुसार सात्त्विक, राजस एवं तामस प्रेतों के निमित्त अलग-अलग पिंड अर्पित किए जाते हैं। सात्त्विक प्रेत के लिए जौ, राजस प्रेत के लिए चावल तथा तामस प्रेत के लिए तिल की पीठी से पिंड बनाए जाने की परंपरा बताई गई है।

गया जी को सनातन परंपरा में पितरों के श्राद्ध एवं पिंडदान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। विष्णुपद मंदिर भगवान श्रीहरि विष्णु के पवित्र चरणचिह्न से प्रतिष्ठित है। इस पवित्र क्षेत्र में त्रिपिंडी श्राद्ध अपने ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों की तृप्ति, शांति एवं सद्गति की मंगलकामना के लिए कराया जाता है।

Duration

3h – 4h

Best time

सुबह

Starting price

₹15,000

लाभ

  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध के माध्यम से पितरों की तृप्ति एवं शांति की मंगलकामना की जाती है।
  • पूर्वजों की सद्गति एवं मोक्ष की प्राप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की जाती है।
  • पितृ दोष एवं पितृ संबंधी बाधाओं की शांति तथा परिवार के कल्याण की कामना की जाती है।
  • प्रेत संबंधी बाधाओं की शांति एवं उनसे संबंधित अशुभ प्रभावों के शमन की मंगलकामना की जाती है।
  • परिवार में सुख-शांति, सौहार्द एवं आपसी सामंजस्य की प्राप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है।
  • विवाह एवं संतान संबंधी बाधाओं में राहत तथा अनुकूल परिस्थितियों की प्राप्ति की मंगलकामना की जाती है।
  • आर्थिक एवं व्यवसायिक जीवन में स्थिरता, प्रगति एवं उन्नति के लिए प्रार्थना की जाती है।
  • परिवार के सुख, कल्याण, समृद्धि एवं मंगल की श्रद्धापूर्वक मंगलकामना की जाती है।
  • पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता एवं पितृ धर्म का विधिपूर्वक निर्वहन करने का पवित्र अवसर प्राप्त होता है।
  • परिवार की पितृ परंपरा को शास्त्रीय रीति से आगे बढ़ाने तथा पूर्वजों के प्रति अपने धार्मिक कर्तव्य का पालन करने का अवसर मिलता है।

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा

विष्णुपद मंदिर, गया जी में सम्पन्न होने वाला त्रिपिंडी श्राद्ध पितृ परंपरा से जुड़ा विशेष धार्मिक अनुष्ठान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान से उनकी तृप्ति एवं सद्गति की मंगलकामना की जाती है।

ज्योतिषीय परंपरा में जन्मकुंडली में सूर्य, राहु, केतु तथा अन्य ग्रहों की विशेष स्थितियों के आधार पर पितृ दोष का विचार किया जाता है। यदि योग्य ज्योतिषाचार्य द्वारा पितृ संबंधी दोष या बाधा बताई जाए, तो कुल परंपरा एवं आचार्य के मार्गदर्शन में त्रिपिंडी श्राद्ध कराने की परंपरा है।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि विवाह, संतान, स्वास्थ्य, आर्थिक या पारिवारिक समस्याओं का कारण केवल पितृ दोष को नहीं माना जाना चाहिए। इन विषयों का स्वतंत्र रूप से उचित परीक्षण एवं आवश्यक परामर्श लेना उचित है।

मुख्य देवता एवं धार्मिक महत्व

त्रिपिंडी श्राद्ध की शास्त्रीय परंपरा में भगवान विष्णु, भगवान ब्रह्मा एवं भगवान रुद्र से संबंधित पूजन एवं सूक्त-पाठ का विधान मिलता है। इन देवताओं के स्मरण एवं पूजन के साथ पितृ कर्म सम्पन्न कर पितरों की तृप्ति, शांति एवं सद्गति की मंगलकामना की जाती है।

विष्णुपद मंदिर, गया जी भगवान श्रीहरि विष्णु के चरणचिह्न से प्रतिष्ठित पवित्र तीर्थ है। गया क्षेत्र में पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान की प्राचीन धार्मिक परंपरा रही है। इसी कारण विष्णुपद क्षेत्र में किया जाने वाला पितृ कर्म विशेष धार्मिक महत्व रखता है।

त्रिपिंडी श्राद्ध कब कराया जाता है?

शास्त्रीय पद्धति में कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष एवं माघ मास को त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए विशेष बताया गया है। इसके अतिरिक्त अमावस्या, पूर्णिमा तथा अन्य उपयुक्त तिथियों पर भी कुल परंपरा एवं वैदिक आचार्य के मार्गदर्शन में यह अनुष्ठान कराया जा सकता है।

यदि किसी विशेष परिस्थिति में प्रतीक्षा करना उचित न हो, तो योग्य वैदिक आचार्य के मार्गदर्शन में अन्य समय भी यह पितृ कर्म सम्पन्न कराया जा सकता है।

त्रिपिंडी श्राद्ध को सामान्य वार्षिक श्राद्ध की तरह प्रत्येक वर्ष अनिवार्य रूप से दोहराने का विधान नहीं माना जाता। यह एक विशेष पितृ कर्म है, जिसे आवश्यकता, कुल परंपरा एवं आचार्य के मार्गदर्शन के अनुसार कराया जाता है। इसके पश्चात पितरों की निर्धारित तिथि पर वार्षिक श्राद्ध एवं तर्पण किया जा सकता है।

किन परिस्थितियों में त्रिपिंडी श्राद्ध कराया जाता है?

धार्मिक एवं ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार निम्न परिस्थितियों में पितृ शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध की सलाह दी जा सकती है—

  • जन्मकुंडली में पितृ दोष बताए जाने पर।
  • पूर्वजों का श्राद्ध या तर्पण लंबे समय से न हो पाने पर।
  • किसी दिवंगत व्यक्ति के निमित्त धार्मिक कर्म अधूरा रह जाने पर।
  • असामयिक या असामान्य मृत्यु के बाद विशेष पितृ शांति की आवश्यकता मानी जाने पर।
  • परिवार में पितृ बाधा से संबंधित धार्मिक मान्यता होने पर।
  • विवाह, संतान, आर्थिक स्थिति या पारिवारिक जीवन में लगातार बाधाओं को ज्योतिषीय परीक्षण में पितृ संबंधी दोष से जोड़े जाने पर।
  • पूर्वजों से संबंधित स्वप्न बार-बार आने की धार्मिक मान्यता होने पर।

त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन पिंडों का महत्व

त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन पिंडों का विशेष महत्व माना जाता है। शास्त्रीय परंपरा के अनुसार—

  • सात्त्विक प्रेत के निमित्त जौ की पीठी से पिंड अर्पित किया जाता है।
  • राजस प्रेत के निमित्त चावल की पीठी से पिंड अर्पित किया जाता है।
  • तामस प्रेत के निमित्त तिल की पीठी से पिंड अर्पित किया जाता है।

इन तीनों पिंडों के माध्यम से संबंधित प्रेतों की तृप्ति, शांति एवं उत्तम गति की मंगलकामना की जाती है।

त्रिपिंडी श्राद्ध में किन पूर्वजों का स्मरण किया जाता है?

त्रिपिंडी श्राद्ध में पितृवंश, मातृवंश, गुरु, श्वसुर तथा अन्य दिवंगत बंधुजनों सहित ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।

पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे तथैव च।

गुरूश्वशुरबन्धूनां ये चान्ये बान्धवा मृताः॥

इनके अतिरिक्त जिन पूर्वजों को किसी कारण से पिंड प्राप्त नहीं हो सका, जिनके निमित्त धार्मिक क्रियाएँ पूर्ण नहीं हो पाईं अथवा जो श्राद्ध कर्म से वंचित रह गए, उनके लिए भी पिंड अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।

त्रिपिंडी श्राद्ध के मुख्य मंत्र एवं पाठ

त्रिपिंडी श्राद्ध की शास्त्रीय पद्धति में भगवान विष्णु, भगवान ब्रह्मा एवं भगवान रुद्र से संबंधित सूक्त-पाठ का विधान मिलता है।

  • विष्णु सूक्त
  • ब्रह्म सूक्त
  • रुद्र सूक्त

इनके पाठ एवं देव पूजन के साथ पितृ कर्म सम्पन्न कर पितरों की तृप्ति, शांति एवं सद्गति की मंगलकामना की जाती है।

त्रिपिंडी श्राद्ध के धार्मिक लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध के माध्यम से—

  • पितरों की तृप्ति एवं शांति की मंगलकामना की जाती है।
  • पूर्वजों की सद्गति एवं मोक्ष की प्रार्थना की जाती है।
  • पितृ दोष एवं पितृ संबंधी बाधाओं की शांति की कामना की जाती है।
  • प्रेत संबंधी बाधाओं की शांति की मंगलकामना की जाती है।
  • परिवार में सुख, शांति एवं सौहार्द की प्रार्थना की जाती है।
  • विवाह एवं संतान संबंधी बाधाओं में राहत की मंगलकामना की जाती है।
  • आर्थिक एवं व्यवसायिक उन्नति के लिए प्रार्थना की जाती है।
  • परिवार के कल्याण एवं समृद्धि की मंगलकामना की जाती है।
  • पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता एवं पितृ धर्म का निर्वहन होता है।
  • पितृ परंपरा को शास्त्रीय रीति से आगे बढ़ाने का अवसर प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक महत्व

त्रिपिंडी श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता एवं स्मरण की सनातन परंपरा है। तीन पिंडों के माध्यम से पितरों एवं प्रेतों की तृप्ति, शांति तथा सद्गति की मंगलकामना की जाती है।

विष्णुपद मंदिर, गया जी में भगवान श्रीहरि विष्णु की पवित्र साक्षी में सम्पन्न यह पितृ कर्म पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने तथा पितृ धर्म का पालन करने का विशेष माध्यम माना जाता है।

विशेष जानकारी

  • यह अनुष्ठान अनुभवी वैदिक आचार्यों के मार्गदर्शन में शास्त्रीय विधि के अनुसार सम्पन्न कराया जाता है।
  • संकल्प के लिए यजमान का नाम एवं गोत्र आवश्यक होता है।
  • पितरों के नाम एवं यजमान से उनका संबंध ज्ञात होने पर उन्हें संकल्प में सम्मिलित किया जा सकता है।
  • उपलब्ध होने पर जन्म एवं मृत्यु संबंधी जानकारी भी उपयोगी होती है।
  • महिला एवं पुरुष दोनों अपनी कुल एवं पारिवारिक परंपरा के अनुसार यजमान बन सकते हैं।
  • यदि परिवार में पुरुष सदस्य उपलब्ध न हो, तो कुल परंपरा एवं वैदिक आचार्य के मार्गदर्शन में महिला यजमान द्वारा संकल्प लिया जा सकता है।
  • श्राद्ध कर्म के समय स्वच्छ एवं पारंपरिक वस्त्र धारण करना उचित माना जाता है।

विष्णुपद मंदिर, गया जी में त्रिपिंडी श्राद्ध का विशेष महत्व

विष्णुपद मंदिर, गया जी भगवान श्रीहरि विष्णु के पवित्र चरणचिह्न से प्रतिष्ठित महत्वपूर्ण पितृ तीर्थ है। गया जी की धार्मिक परंपरा में पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है।

यहाँ त्रिपिंडी श्राद्ध के माध्यम से सात्त्विक, राजस एवं तामस प्रेतों के निमित्त तीन पिंड अर्पित कर उनकी तृप्ति, शांति एवं सद्गति की मंगलकामना की जाती है। भगवान श्रीहरि विष्णु की पवित्र साक्षी में किया जाने वाला यह पितृ कर्म अपने ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता एवं पितृ धर्म के निर्वहन का विशेष माध्यम माना जाता है।

पूजा स्थानगया

श्री विष्णुपद मंदिर

श्री विष्णुपद मंदिर

गया

विष्णुपाद मंदिर गया में फल्गु नदी के तट पर स्थित एक अत्यंत पवित्र और प्राचीन हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और अपनी धर्मशिला (भगवान विष्णु के चरणचिह्न) के लिए विश्वप्रसिद्ध है। लगभग 40 सेंटीमीटर लंबे ये पवित्र चरणचिह्न गर्भगृह में चांदी के आवरण के भीतर स्थापित हैं।

इतिहास एवं पौराणिक कथा

गयासुर की कथा

पुराणों के अनुसार गयासुर नामक एक दैत्य ने कठोर तपस्या कर महान शक्तियाँ प्राप्त कर ली थीं। भगवान विष्णु ने उससे यज्ञ हेतु उसके शरीर को समर्पित करने का निवेदन किया और अंततः उसे पृथ्वी के नीचे स्थापित कर दिया। उसी स्थान पर धर्मशिला पर भगवान विष्णु के चरणचिह्न अंकित हुए, जिन्हें आज विष्णुपाद मंदिर में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है।

पिंडदान का महत्व

मान्यता है कि यहाँ पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष, शांति और संतोष की प्राप्ति होती है। इसी कारण गया हिंदू धर्म का एक प्रमुख मोक्ष-धाम माना जाता है।

भव्य वास्तुकला

विष्णुपाद मंदिर विशाल ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है। इसकी अष्टकोणीय (आठ-भुज) संरचना लगभग 100 फीट ऊँची है। मंदिर में चारों ओर सुंदर नक्काशीदार स्तंभ हैं तथा शिखर पर लगभग 50 किलो स्वर्ण ध्वजा और कलश स्थापित है, जो इसकी दिव्यता को दर्शाते हैं।

धर्मशिला एवं पूजन

गर्भगृह में भगवान विष्णु के पवित्र चरणचिह्न चांदी के आवरण से सुरक्षित हैं। सामने माता लक्ष्मी की प्रतिमा भी विराजमान है, जिनकी प्रतिदिन विधि-विधान से पूजा और श्रृंगार किया जाता है।

पिंडदान एवं तर्पण अनुष्ठान

विष्णुपाद मंदिर पिंडदान और पितृश्राद्ध का प्रमुख केंद्र है। श्रद्धालु फल्गु नदी के तट पर तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और श्राद्ध कर्म संपन्न करते हैं। विशेष रूप से पितृपक्ष के दौरान लाखों भक्त यहाँ अपने पितरों की शांति हेतु अनुष्ठान कराते हैं।

श्राद्धकाल का महत्व

पितृ पक्ष एवं अमावस्या के अवसर पर यहाँ विशेष पूजा-अनुष्ठान आयोजित होते हैं। श्रद्धालु पूर्ण वैदिक विधि से पिंडदान और तर्पण कराते हैं।

Puजरिजि.coम द्वारा उपलब्ध सेवाएँ

  • पूजा आयोजन एवं पिंडदान सेवा – शास्त्रसम्मत विधि से पिंडदान, तर्पण एवं श्राद्ध की संपूर्ण व्यवस्था।
  • अनुभवी पंडित मार्गदर्शन – वैदिक मंत्रोच्चारण, संकल्प और पूजा सामग्री सहित पूर्ण सहयोग।
  • ऑन-साइट एवं ऑनलाइन सुविधा – स्थल पर व्यवस्था तथा ऑनलाइन बुकिंग विकल्प।
  • ब्राह्मण भोजन एवं दान सेवा – पूजा के पश्चात ब्राह्मण भोजन, दक्षिणा और श्रद्धादान की व्यवस्था।

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धार्मिक महत्ता

पितरों को मोक्ष एवं शांति – विधिवत पिंडदान से पूर्वजों को मोक्ष मार्ग और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

परिवार में समृद्धि और संतुलन – पितृश्राद्ध से कुल में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और सुख-समृद्धि का अनुभव होता है।

आध्यात्मिक अनुभूति – फल्गु नदी के तट पर अनुष्ठान करने से मन में गहन शांति, भक्ति और आत्मिक संतुलन की अनुभूति होती है।

पहुँच एवं यात्रा

📌 स्थानः विष्णुपाद मंदिर रोड, चांद चौरा, गया, बिहार – 823001

🚆 निकटतम रेलवे स्टेशनः गया जंक्शन (ऑटो/कैब से सहज पहुँच)

✈️ निकटतम हवाई अड्डाः गया एयरपोर्ट

श्री विष्णुपाद मंदिर, गया जी — भगवान विष्णु के पवित्र पदचिह्न पर निर्मित यह प्राचीन तीर्थ पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है। यह स्थल पितृमोक्ष, परिवार की शांति और आध्यात्मिक उन्नति का दिव्य स्थान है।

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    त्रिपिंडी श्राद्ध में सात्त्विक, राजस एवं तामस प्रेतों के निमित्त तीन पिंड अर्पित किए जाते हैं। शास्त्रीय विधान के अनुसार सात्त्विक प्रेत के लिए जौ, राजस प्रेत के लिए चावल तथा तामस प्रेत के लिए तिल की पीठी से पिंड तैयार किए जाते हैं। यह अनुष्ठान पितृ दोष, पितृ बाधा या प्रेत बाधा की धार्मिक मान्यता, पूर्वजों के अपूर्ण श्राद्ध कर्म अथवा पितरों की शांति एवं सद्गति की कामना से कराया जाता है।

    पूजा में शामिल विधियां

    • श्राद्ध संकल्प
    • पितृ तर्पण
    • भगवान विष्णु का पूजन
    • भगवान ब्रह्मा का पूजन
    • भगवान रुद्र का पूजन
    • सात्त्विक, राजस एवं तामस प्रेत आवाहन एवं पूजन
    • विष्णु सूक्त पाठ
    • ब्रह्म सूक्त पाठ
    • रुद्र सूक्त पाठ
    • सात्त्विक प्रेत के निमित्त जौ के पिंड
    • राजस प्रेत के निमित्त चावल के पिंड
    • तामस प्रेत के निमित्त तिल के पिंड
    • पिंड अर्पण एवं तर्पण
    • पितृ शांति एवं सद्गति की प्रार्थना
    • दान-दक्षिणा
    • पिंड विसर्जन

    विशेष सुविधाएं

    • विष्णुपद मंदिर, गया जी में शास्त्रीय परंपरा के अनुसार त्रिपिंडी श्राद्ध सम्पन्न कराया जाएगा।
    • सात्त्विक, राजस एवं तामस प्रेतों के निमित्त तीन पिंडों का विधिपूर्वक अर्पण किया जाएगा।
    • भगवान विष्णु, ब्रह्मा एवं रुद्र से संबंधित पूजन एवं सूक्त पाठ सम्पन्न किए जाएंगे।
    • यजमान के नाम, गोत्र एवं पितरों के संकल्प के साथ पितृ कर्म कराया जाएगा।
    • भगवान श्रीहरि विष्णु की पवित्र साक्षी में पितरों की शांति एवं सद्गति की प्रार्थना की जाएगी।
    • यदि परिवार में कोई पुरुष सदस्य उपलब्ध नहीं है, तो कुल परंपरा एवं वैदिक आचार्य के मार्गदर्शन के अनुसार महिला यजमान भी संकल्प लेकर त्रिपिंडी श्राद्ध करा सकती हैं।
    • यजमान को अनुष्ठान के समय स्वच्छ एवं पारंपरिक वस्त्र धारण करने चाहिए।

    आवश्यक जानकारी

    • यजमान का नाम
    • गोत्र
    • पितरों के नाम एवं संबंध, यदि उपलब्ध हों
    • श्राद्ध के लिए निर्धारित तिथि
    • आवश्यक पारिवारिक एवं पितृ संबंधी जानकारी

    विष्णुपद मंदिर, गया जी में सम्पन्न यह त्रिपिंडी श्राद्ध पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता एवं पितृ धर्म की भावना से किया जाने वाला पवित्र अनुष्ठान है। इसके माध्यम से पूर्वजों की तृप्ति, शांति, सद्गति एवं मोक्ष की मंगलकामना की जाती है।

    सभी पूजा सामग्रीदक्षिणा
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भक्तों की प्रतिक्रिया

भक्तों का अनुभव

पूरी प्रक्रिया बहुत सरल थी। पंडित जी ने पूरी श्रद्धा से सत्यनारायण पूजा संपन्न की और हमें उसी दिन वीडियो प्रमाण मिल गया।

प्रिया शर्मा

मुंबईSatyanarayan Puja

विदेश में रहते हुए काशी में प्रामाणिक पूजा कराने को लेकर चिंतित था। पुजारीजी ने सब कुछ संभाला — सामग्री से लेकर संकल्प तक।

राजेश गुप्ता

सैन फ्रांसिस्को, अमेरिकाRudrabhishek

अपने नए घर के लिए ग्रह शांति पूजा बुक की। पंडित जी बहुत ज्ञानी थे और हर चरण समझाया। वीडियो रिकॉर्डिंग बहुत अच्छी लगी।

मीना अय्यर

बैंगलोरGraha Shanti Puja

सामान्य पूछे जाने वाले प्रश्न

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कैसे काम करता है

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