“पूरी प्रक्रिया बहुत सरल थी। पंडित जी ने पूरी श्रद्धा से सत्यनारायण पूजा संपन्न की और हमें उसी दिन वीडियो प्रमाण मिल गया।”
प्रिया शर्मा
मुंबई• Satyanarayan Puja

सनातन परंपरा के अनुसार, मृत्यु के पश्चात अस्थियों का गंगा जी में विसर्जन करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। काशी के मणिकर्णिका घाट पर विधि-विधान से किया गया अस्थि विसर्जन पितरों की आत्मा को शांति प्रदान करता है तथा परिवार के लिए आध्यात्मिक संतुलन और पितृ कृपा का मार्ग प्रशस्त करता है।
Duration
30 min – 1h
Best time
सुबह
Starting price
₹3,500
वाराणसी के पवित्र मणिकर्णिका घाट में अस्थि विसर्जन हिन्दू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मोक्षदायी संस्कार माना जाता है। सनातन मान्यता के अनुसार, मृत्यु के पश्चात शरीर पंचतत्वों में विलीन हो जाता है और अग्नि संस्कार के बाद शेष बची अस्थियों को पवित्र नदी में प्रवाहित किया जाता है, जिसे “अस्थि विसर्जन” कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काशी की मोक्षदायिनी गंगा में अस्थि विसर्जन करने से दिवंगत आत्मा को शांति, सद्गति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्कंद पुराण के काशी खंड तथा गरुड़ पुराण में काशी को भगवान शिव की नगरी और मोक्ष प्रदान करने वाला दिव्य तीर्थ बताया गया है, जहाँ स्वयं भगवान शिव जीवात्मा को तारक मंत्र प्रदान करते हैं। इसी कारण भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त अस्थि विसर्जन हेतु काशी आते हैं।
मणिकर्णिका घाट हिन्दू धर्म के सबसे प्राचीन और पवित्र घाटों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती का “मणिकर्ण” अर्थात कर्णफूल इस स्थान पर गिरा था, जिसके कारण इसका नाम “मणिकर्णिका” पड़ा। यह घाट सदियों से अंतिम संस्कार, पिंडदान और पितृ कर्मों का प्रमुख केंद्र रहा है। मान्यता है कि यहाँ किए गए पितृ कर्म आत्मा को जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्ति दिलाकर परम शांति प्रदान करते हैं।
अस्थि विसर्जन सामान्यतः मृत्यु के बाद 3वें, 5वें, 7वें, 9वें अथवा 10वें दिन किया जाता है। प्रातः काल, विशेष रूप से सूर्योदय के बाद का समय शुभ माना जाता है। यदि परिवार तत्काल काशी नहीं आ सकता, तो अस्थियों को सुरक्षित रखकर बाद में भी विसर्जन किया जा सकता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार गंगा में अस्थि विसर्जन करने से पितृ दोष शांति, आत्मा की तृप्ति और परिवार में सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
इस अनुष्ठान की प्रक्रिया वैदिक मंत्रोच्चार एवं संकल्प के साथ प्रारम्भ होती है। सबसे पहले गंगा तट पर दिवंगत आत्मा का नाम एवं गोत्र लेकर संकल्प कराया जाता है। इसके पश्चात गंगाजल, तिल, पुष्प, दूध तथा अन्य पवित्र सामग्री से अस्थि पूजन किया जाता है। आवश्यकता अनुसार पिंडदान एवं तर्पण संस्कार भी सम्पन्न कराए जाते हैं। तत्पश्चात नाव द्वारा गंगा जी के मध्य में जाकर वैदिक विधि से अस्थि विसर्जन कराया जाता है। अंत में शांति पाठ और गंगा स्नान के साथ यह पवित्र प्रक्रिया पूर्ण होती है।
विधि-विधान और श्रद्धा के साथ किया गया अस्थि विसर्जन दिवंगत आत्मा की शांति, पितरों की कृपा तथा परिवार में आध्यात्मिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

वाराणसी
जो भक्त यात्रा नहीं कर पाते, उनके लिए हम तीर्थ पर उनके नाम और संकल्प से पूजा संपन्न कराते हैं और, जहाँ संभव हो, वीडियो व प्रसाद उन तक पहुँचाते हैं — पूरा अनुष्ठान, आपकी ओर से।
1 आचार्य + सभी पूजा सामग्री
वाराणसी के पवित्र मणिकर्णिका घाट में सम्पन्न होने वाला अस्थि विसर्जन संस्कार हिन्दू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मोक्षदायी कर्म माना जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार मृत्यु के पश्चात शरीर पंचतत्वों में विलीन हो जाता है तथा अग्नि संस्कार के बाद शेष बची अस्थियों को पवित्र नदी में प्रवाहित किया जाता है, जिसे “अस्थि विसर्जन” कहा जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि काशी की मोक्षदायिनी गंगा में अस्थि विसर्जन करने से दिवंगत आत्मा को शांति, सद्गति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्कंद पुराण के काशी खंड तथा गरुड़ पुराण में काशी को भगवान शिव की नगरी एवं मोक्ष प्रदान करने वाला दिव्य तीर्थ बताया गया है। मान्यता है कि यहाँ स्वयं भगवान शिव जीवात्मा को तारक मंत्र प्रदान कर जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति प्रदान करते हैं। इसी कारण देश-विदेश से श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त अस्थि विसर्जन हेतु काशी आते हैं।
मणिकर्णिका घाट हिन्दू धर्म के सबसे प्राचीन एवं पवित्र घाटों में से एक माना जाता है। पौराणik कथाओं के अनुसार माता पार्वती का “मणिकर्ण” (कर्णफूल) इस स्थान पर गिरा था, जिसके कारण इसका नाम “मणिकर्णिका” पड़ा। यह घाट सदियों से अंतिम संस्कार, पिंडदान एवं पितृ कर्मों का प्रमुख केंद्र रहा है। मान्यता है कि यहाँ किए गए पितृ कर्म आत्मा को परम शांति और मोक्ष प्रदान करते हैं।
अस्थि विसर्जन सामान्यतः मृत्यु के बाद 3वें, 5वें, 7वें, 9वें अथवा 10वें दिन किया जाता है। प्रातः सूर्योदय के बाद का समय शुभ माना जाता है। यदि परिवार तत्काल काशी नहीं आ सकता, तो अस्थियों को सुरक्षित रखकर बाद में भी विसर्जन किया जा सकता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार गंगा में अस्थि विसर्जन करने से पितृ दोष शांति, आत्मा की तृप्ति और परिवार में सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
यह प्रक्रिया वैदिक मंत्रोच्चार एवं संकल्प के साथ प्रारम्भ होती है। सबसे पहले गंगा तट पर दिवंगत आत्मा का नाम एवं गोत्र लेकर संकल्प कराया जाता है। इसके पश्चात गंगाजल, तिल, पुष्प, दूध एवं पवित्र सामग्री से अस्थि पूजन किया जाता है। आवश्यकता अनुसार पिंडदान एवं तर्पण संस्कार भी सम्पन्न कराए जाते हैं। तत्पश्चात नाव द्वारा गंगा जी के मध्य में जाकर वैदिक विधि से अस्थि विसर्जन कराया जाता है। अंत में शांति पाठ, आशीर्वचन एवं गंगा स्नान के साथ अनुष्ठान पूर्ण होता है।
पूजा में शामिल प्रमुख विधियां
7 वस्तुएँ शामिल
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WhatsAppभक्तों की प्रतिक्रिया
“पूरी प्रक्रिया बहुत सरल थी। पंडित जी ने पूरी श्रद्धा से सत्यनारायण पूजा संपन्न की और हमें उसी दिन वीडियो प्रमाण मिल गया।”
प्रिया शर्मा
मुंबई• Satyanarayan Puja
“विदेश में रहते हुए काशी में प्रामाणिक पूजा कराने को लेकर चिंतित था। पुजारीजी ने सब कुछ संभाला — सामग्री से लेकर संकल्प तक।”
राजेश गुप्ता
सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका• Rudrabhishek
“अपने नए घर के लिए ग्रह शांति पूजा बुक की। पंडित जी बहुत ज्ञानी थे और हर चरण समझाया। वीडियो रिकॉर्डिंग बहुत अच्छी लगी।”
मीना अय्यर
बैंगलोर• Graha Shanti Puja
एक बार जानकारी दें। पुजारी, सामग्री, विधि-विधान और अपडेट — सब आपके लिए संभाला जाता है।
पूजा, तिथि और संकल्प की जानकारी दें।
जाँचे-परखे, आपकी पूजा के अनुसार।
हर वस्तु लाई जाती है — आपको कुछ नहीं जुटाना।
तीर्थ पर आपके नाम और संकल्प से।
संपन्न पूजा का आशीर्वादित प्रसाद और पूर्ण आशीर्वाद आपको।
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