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Pujari Ji

त्रिपिंडी श्राद्ध

त्र्यंबकेश्वर तीर्थ, त्र्यंबकेश्वर
  • प्रमाणित पुजारी
  • पूरी पूजा सामग्री
  • वैदिक विधि-विधान
  • मार्गदर्शन व सहायता
त्रिपिंडी श्राद्ध

त्रिपिंडी श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है, जिन्हें किसी कारणवश शांति नहीं मिल पाई हो। यह अनुष्ठान पितृ दोष को दूर कर जीवन में सुख, समृद्धि और स्थिरता लाता है।

Duration

2h – 3h

Starting price

₹11,000

लाभ

  • यह पूजा विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जिनकी कुंडली में पितृ दोष विद्यमान हो ।
  • यह पूजा असामयिक बाधाओं, बीमारियों, वित्तीय नुकसान और अन्य समस्याओं को दूर करती है।
  • इस श्राद्ध में तिल, जौ और चावल के पिंड बनाए जाते हैं और पवित्र मंत्रों के साथ अर्पण किए जाते हैं।
  • त्रिपिंडी श्राद्ध करने से परिवार में सुख-शांति, स्वास्थ्य, सौभाग्य और समृद्धि बनी रहती है तथा जीवन में उन्नति के मार्ग प्रशस्त होते हैं

त्रिपिंडी श्राद्ध

त्रिपिंडी श्राद्ध का महत्त्व पितरों की आत्मा की शांति, तृप्ति और मोक्ष प्राप्ति में निहित है। यह श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए विशेष रूप से किया जाता है जिनका विधिपूर्वक श्राद्ध या तर्पण नहीं हुआ हो या जो प्रेत योनि में भटक रहे हों।

त्रिपिंडी श्राद्ध का प्रमुख महत्त्वः

• पितरों की तृप्तिः इस श्राद्ध से पितरों की आत्मा संतुष्ट होती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

• पितृ दोष निवारणः जिन परिवारों में पितृ दोष होता है, उनके लिए त्रिपिंडी श्राद्ध अति आवश्यक माना जाता है। इससे पितृ दोष दूर होता है।

• कुल की उन्नतिः पितरों की कृपा से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

• अवांछित बाधाओं का नाशः यह श्राद्ध जीवन में आ रही रुकावटें, आर्थिक समस्याएँ और अन्य बाधाओं को दूर करता है।

• आत्मिक शांतिः इस कर्म से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।

त्रिपिंडी श्राद्ध के माध्यम से व्यक्ति अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है और उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त करता है।

विशेष निर्देश – पूजा के वस्त्र के बारे में

पूजा के समय नए वस्त्र पहनना अनिवार्य है

पूजा पूर्ण होने के बाद, ये वस्त्र वहीं मंदिर में छोड़ना होता है

यह नियम सभी के लिए है — महिला एवं पुरुष दोनों

अतः पूजा में आने से पहले नए कपड़े साथ अवश्य लाएँ और पूजा के दौरान उन्हें ही धारण करें

पूजा स्थानत्र्यंबकेश्वर

त्र्यंबकेश्वर तीर्थ

त्र्यंबकेश्वर तीर्थ

त्र्यंबकेश्वर

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का उल्लेख शिवपुराण, स्कंदपुराण, पद्मपुराण और लिंगपुराण में विशेष रूप से मिलता है। यह केवल एक ज्योतिर्लिंग स्थल नहीं, बल्कि ऋषि-तप, यज्ञ, पितृ कर्म, श्राद्ध और ग्रह-दोष शांति की आदि भूमि मानी जाती है।

ब्रह्मगिरि पर्वत को पुराणों में “तपोभूमि” कहा गया है, जहाँ वैदिक काल से ही महर्षि-मुनियों ने कठोर तपस्या, यज्ञ और वेदाध्ययन किया। शास्त्रों में उल्लेख है कि यह क्षेत्र त्रेता और द्वापर युग से ही अत्यंत पवित्र रहा है तथा यहाँ की गई शिव-आराधना शीघ्र फलदायी मानी जाती है।

शिवपुराण व स्कंदपुराण से पौराणिक कथा

शिवपुराण और स्कंदपुराण के अनुसार महर्षि गौतम और माता अहिल्या ने ब्रह्मगिरि पर्वत पर कठोर तप किया। उनके आश्रम में कभी अकाल नहीं पड़ा, जबकि आसपास के क्षेत्र में संकट था। इससे कुछ ऋषियों में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और उन्होंने गौतम ऋषि को गौहत्या का दोषी ठहराने के लिए षड्यंत्र रचा।

प्रायश्चित स्वरूप गौतम ऋषि ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपनी जटाओं से गोदावरी नदी को पृथ्वी पर प्रवाहित किया। उसी क्षण वे स्वयं यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए, जो आगे चलकर त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग कहलाया।

शिवपुराण का श्लोकः

“गौतमस्य तपोबलात्

शिवः प्रसन्नतामगात् ।

जटाजूटात् समुत्पन्ना

गोदावरी महा नदी ॥”

अर्थः गौतम ऋषि के तपोबल से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपनी जटाओं से गोदावरी नदी को उत्पन्न किया।

“त्र्यंबक” नाम का गूढ़ रहस्य

पुराणों के अनुसार भगवान शिव यहाँ “त्र्यंबक” कहलाते हैं क्योंकि—

  • वे त्रिनेत्रधारी हैं।
  • वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों शक्तियों के अधिष्ठाता हैं।
  • वे तीनों लोकों (भू, भुवः, स्वः) के संचालक हैं।

यहाँ स्थित ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह मानी जाती है कि इसमें तीन मुखाकार स्वरूप निहित हैं, जो इसे अन्य ज्योतिर्लिंगों से विशिष्ट बनाते हैं।

गोदावरी नदी का पौराणिक व आध्यात्मिक महत्व

गोदावरी को शास्त्रों में “दक्षिण की गंगा” कहा गया है। पद्मपुराण में वर्णन मिलता है—

“गंगाया दक्षिणे भागे

गोदावरी महामुने।”

अर्थः दक्षिण दिशा में गोदावरी, गंगा का ही स्वरूप है।

इसी कारण त्र्यंबकेश्वर में स्नान, तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों को शीघ्र शांति और साधक को पुण्य की प्राप्ति होती है।

कुंडली दोष निवारण से जुड़ी पौराणिक मान्यता

शास्त्रों के अनुसार नाग दोष, पितृ दोष और ग्रह दोष मनुष्य के पूर्व जन्म के कर्म एवं पितृ ऋण से जुड़े होते हैं। शिवपुराण में उल्लेख है—

“नागानां प्रकोपो यत्र

तत्र शम्भु स्मरणं शुभम्।”

अर्थः जहाँ नाग दोष हो, वहाँ शिव-स्मरण और शिव क्षेत्र में किया गया अनुष्ठान शीघ्र फल देता है।

इसी कारण त्र्यंबकेश्वर को—

  • कालसर्प दोष शांति पूजा
  • नारायण नागबली पूजा
  • पितृ दोष निवारण एवं त्रिपिंडी श्राद्ध
  • रुद्राभिषेक एवं महामृत्युंजय जाप
  • नवग्रह शांति पूजा
  • श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान

का सर्वोच्च केंद्र माना गया है।

ऐतिहासिक मंदिर संरचना

वर्तमान त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में पेशवा काल में कराया गया माना जाता है। काले पत्थर से निर्मित यह मंदिर प्राचीन नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी भव्य शिल्पकला, वैदिक प्रतीक और स्थापत्य आज भी इसे जीवंत आध्यात्मिक केंद्र बनाए हुए हैं।

शास्त्रोक्त पूजा विधि (संक्षेप)

  • संकल्प एवं आचमन
  • गणेश पूजन
  • दोषानुसार वैदिक अनुष्ठान
  • हवन एवं पूर्णाहुति
  • शिव अभिषेक एवं आशीर्वाद

Puजरिजि.coम कैसे निभाता है यह परंपरा

Puजरिजि.coम त्र्यंबकेश्वर की हजारों वर्ष पुरानी आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक सुविधा के साथ श्रद्धालुओं तक पहुँचाता है—

  • शास्त्र-प्रमाणित एवं अनुभवी आचार्य
  • शुद्ध वैदिक विधि एवं प्रमाणिक सामग्री
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  • उन्नत

    3 आचार्य + सभी पूजा सामग्री

    4h

    इस पैकेज में आचार्य एवं सभी आवश्यक पूजा सामग्री शामिल है, जो पितृ शांति एवं पिंडदान अनुष्ठान को पवित्र तीर्थ क्षेत्र में विधि-विधान से सम्पन्न करने के लिए किया जाता है।

    पूजा की अवधि लगभग 3 से 4 घंटे होती है।

    पूजा प्रक्रिया:

    • आचमन (शुद्धिकरण)
    • संकल्प
    • तर्पण
    • महाविष्णु पूजा
    • कलश स्थापना पूजा
    • मूर्ति पूजा
    • विष्णु, ब्रह्मा एवं रुद्र सूक्त पाठ
    • पिंड दान
    • पिंड पूजा
    • पिंड तर्पण
    • अर्घ्य दान
    • विसर्जन

    विशेष निर्देश:

    • पूजा के दौरान नए वस्त्र पहनना अनिवार्य है
    • पूजा के बाद इन वस्त्रों को मंदिर में ही छोड़ना होता है
    • यह नियम पुरुष और महिलाओं दोनों पर लागू होता है
    • कृपया पूजा में आने से पहले नए वस्त्र साथ लेकर आएं और वही पहनें।
    सभी पूजा सामग्रीदक्षिणा
    ₹11,000₹13,00015% off

    2 वस्तुएँ शामिल

  • श्रेष्ठ

    5 आचार्य + सभी पूजा सामग्री

    4h

    इस पैकेज में 5 आचार्य एवं सभी आवश्यक पूजा सामग्री शामिल है, जो श्राद्ध, पितृ शांति एवं पिंडदान अनुष्ठान को पवित्र तीर्थ क्षेत्र में अधिक विस्तृत और प्रभावशाली रूप से सम्पन्न करता है।

    पूजा की अवधि लगभग 3 से 4 घंटे होती है।

    इस विशेष अनुष्ठान में पितृ सूक्त पाठ (51 बार) के साथ तुलसी अर्पण एवं विष्णु सहस्रनाम जाप शामिल है, जो पूर्वजों की शांति, संतुष्टि और मोक्ष के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

    पूजा प्रक्रिया:

    • आचमन (शुद्धिकरण)
    • संकल्प
    • पितृ तर्पण
    • महाविष्णु पूजा
    • कलश स्थापना पूजा
    • विष्णु, ब्रह्मा एवं रुद्र मूर्ति पूजा
    • विष्णु, ब्रह्मा एवं रुद्र सूक्त पाठ
    • पिंड दान
    • पिंड पूजा
    • पिंड तर्पण
    • अर्घ्य दान
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    विशेष निर्देश:

    • पूजा के दौरान नए वस्त्र पहनना अनिवार्य है
    • पूजा के बाद इन वस्त्रों को मंदिर में ही छोड़ना होता है
    • यह नियम पुरुष और महिलाओं दोनों पर लागू होता है
    • कृपया पूजा में आने से पहले नए वस्त्र साथ लेकर आएं और वही पहनें।
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    ₹15,000₹21,00029% off

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भक्तों की प्रतिक्रिया

भक्तों का अनुभव

पूरी प्रक्रिया बहुत सरल थी। पंडित जी ने पूरी श्रद्धा से सत्यनारायण पूजा संपन्न की और हमें उसी दिन वीडियो प्रमाण मिल गया।

प्रिया शर्मा

मुंबईSatyanarayan Puja

विदेश में रहते हुए काशी में प्रामाणिक पूजा कराने को लेकर चिंतित था। पुजारीजी ने सब कुछ संभाला — सामग्री से लेकर संकल्प तक।

राजेश गुप्ता

सैन फ्रांसिस्को, अमेरिकाRudrabhishek

अपने नए घर के लिए ग्रह शांति पूजा बुक की। पंडित जी बहुत ज्ञानी थे और हर चरण समझाया। वीडियो रिकॉर्डिंग बहुत अच्छी लगी।

मीना अय्यर

बैंगलोरGraha Shanti Puja

सामान्य पूछे जाने वाले प्रश्न

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    हम पूरी पूजा सामग्री की व्यवस्था करते हैं

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    तीर्थ पर आपके नाम और संकल्प से।

  5. पुजारीजी

    आपको प्रसाद व आशीर्वाद मिलता है

    संपन्न पूजा का आशीर्वादित प्रसाद और पूर्ण आशीर्वाद आपको।

हर चरण पर कॉल और व्हाट्सएप पर मार्गदर्शन व सहायता।

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