“पूरी प्रक्रिया बहुत सरल थी। पंडित जी ने पूरी श्रद्धा से सत्यनारायण पूजा संपन्न की और हमें उसी दिन वीडियो प्रमाण मिल गया।”
प्रिया शर्मा
मुंबई• Satyanarayan Puja

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का उल्लेख शिवपुराण, स्कंदपुराण, पद्मपुराण और लिंगपुराण में विशेष रूप से मिलता है। यह केवल एक ज्योतिर्लिंग स्थल नहीं, बल्कि ऋषि-तप, यज्ञ, पितृ कर्म, श्राद्ध और ग्रह-दोष शांति की आदि भूमि मानी जाती है।
ब्रह्मगिरि पर्वत को पुराणों में “तपोभूमि” कहा गया है, जहाँ वैदिक काल से ही महर्षि-मुनियों ने कठोर तपस्या, यज्ञ और वेदाध्ययन किया। शास्त्रों में उल्लेख है कि यह क्षेत्र त्रेता और द्वापर युग से ही अत्यंत पवित्र रहा है तथा यहाँ की गई शिव-आराधना शीघ्र फलदायी मानी जाती है।
शिवपुराण और स्कंदपुराण के अनुसार महर्षि गौतम और माता अहिल्या ने ब्रह्मगिरि पर्वत पर कठोर तप किया। उनके आश्रम में कभी अकाल नहीं पड़ा, जबकि आसपास के क्षेत्र में संकट था। इससे कुछ ऋषियों में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और उन्होंने गौतम ऋषि को गौहत्या का दोषी ठहराने के लिए षड्यंत्र रचा।
प्रायश्चित स्वरूप गौतम ऋषि ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपनी जटाओं से गोदावरी नदी को पृथ्वी पर प्रवाहित किया। उसी क्षण वे स्वयं यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए, जो आगे चलकर त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग कहलाया।
शिवपुराण का श्लोकः
“गौतमस्य तपोबलात्
शिवः प्रसन्नतामगात् ।
जटाजूटात् समुत्पन्ना
गोदावरी महा नदी ॥”
अर्थः गौतम ऋषि के तपोबल से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपनी जटाओं से गोदावरी नदी को उत्पन्न किया।
पुराणों के अनुसार भगवान शिव यहाँ “त्र्यंबक” कहलाते हैं क्योंकि—
यहाँ स्थित ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह मानी जाती है कि इसमें तीन मुखाकार स्वरूप निहित हैं, जो इसे अन्य ज्योतिर्लिंगों से विशिष्ट बनाते हैं।
गोदावरी को शास्त्रों में “दक्षिण की गंगा” कहा गया है। पद्मपुराण में वर्णन मिलता है—
“गंगाया दक्षिणे भागे
गोदावरी महामुने।”
अर्थः दक्षिण दिशा में गोदावरी, गंगा का ही स्वरूप है।
इसी कारण त्र्यंबकेश्वर में स्नान, तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों को शीघ्र शांति और साधक को पुण्य की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों के अनुसार नाग दोष, पितृ दोष और ग्रह दोष मनुष्य के पूर्व जन्म के कर्म एवं पितृ ऋण से जुड़े होते हैं। शिवपुराण में उल्लेख है—
“नागानां प्रकोपो यत्र
तत्र शम्भु स्मरणं शुभम्।”
अर्थः जहाँ नाग दोष हो, वहाँ शिव-स्मरण और शिव क्षेत्र में किया गया अनुष्ठान शीघ्र फल देता है।
इसी कारण त्र्यंबकेश्वर को—
का सर्वोच्च केंद्र माना गया है।
वर्तमान त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में पेशवा काल में कराया गया माना जाता है। काले पत्थर से निर्मित यह मंदिर प्राचीन नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी भव्य शिल्पकला, वैदिक प्रतीक और स्थापत्य आज भी इसे जीवंत आध्यात्मिक केंद्र बनाए हुए हैं।
Puजरिजि.coम त्र्यंबकेश्वर की हजारों वर्ष पुरानी आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक सुविधा के साथ श्रद्धालुओं तक पहुँचाता है—
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Temple Opening Time: 5:00 AM Temple Closing Time: 9:00 PM 🔔 Mangal Aarti: 05:30 AM – 06:00 AM 🔔 Antaralaya Abhishek (Inside Sanctum): 06:00 AM – 07:00 AM 🔔 Mid-day Pooja: 01:00 PM – 01:30 PM 🔔 Shiva Golden Crown Darshan: 04:30 PM – 05:00 PM 🔔 Evening Pooja: 07:00 PM – 09:00 PM
भक्तों की प्रतिक्रिया
“पूरी प्रक्रिया बहुत सरल थी। पंडित जी ने पूरी श्रद्धा से सत्यनारायण पूजा संपन्न की और हमें उसी दिन वीडियो प्रमाण मिल गया।”
प्रिया शर्मा
मुंबई• Satyanarayan Puja
“विदेश में रहते हुए काशी में प्रामाणिक पूजा कराने को लेकर चिंतित था। पुजारीजी ने सब कुछ संभाला — सामग्री से लेकर संकल्प तक।”
राजेश गुप्ता
सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका• Rudrabhishek
“अपने नए घर के लिए ग्रह शांति पूजा बुक की। पंडित जी बहुत ज्ञानी थे और हर चरण समझाया। वीडियो रिकॉर्डिंग बहुत अच्छी लगी।”
मीना अय्यर
बैंगलोर• Graha Shanti Puja
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